Sunday, August 9, 2009

मच्छर

हे मच्छर पहले तो तुम हमें, सिर्फ रात को काटने थे,
वो भी मोटे ताजे, आदमियों को छाटते थे,
लेकिन अब सबकों, एक ही कैटगरी में बाँटते हों,
शर्म नही आती, दिन में भी काटते हो,

मच्छर बोला हम खून को किसी ब्लड बैंक में,
स्टोर करने के लिए थोड़े ले जाते है,
ताजा कमाते है, ताजा खाते है,
हमारा एक—एक साथी, पूरी मेहनत से आगे बढता है,
महंगाई आसमान छू रही है, इसलिए दिन रात काम करना पड़ता है,

वैसे तो हमारे लिए इंसान की तरह बनाया कोई, बोर्डर नही है,
काटने के लिए सारा जहाँ है,
लेकिन अब आदमी में चूसने के लिए, खून बचा ही कहा है,
अरे इंसान तो मच्छर से भी, गई गुजरी जिन्दगी जी रहा है।
क्योकि आज आदमी ही आदमी का, खून पी रहा है,

मच्छर यदि अपनी पूरी तीन दिन की, जिन्दगी में प्यार छोड़ आतंकवाद में खो जाए,
तो मच्छर का तो समझो, अस्तित्व ही समाप्त हो जाए,
वैसे भी अब तो मानव हमसे डरकर, अपनी पूरी हिफाजत से सोते है,
और गुड नाईट, आल आऊट जैसे लोशन, हमारी जान के दुश्मन होते है,
अब तो हमें थोड़ा – थोड़ा, जहरीले पदार्थ खाने का अभ्यास हो गया है,
और डी॰डी॰टी॰ खा—खाकर हमारे अन्दर,
रोग—प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो गया है,

अब ये मत समझना, कि इसे तो ऐसे खा जायेंगे जैसे टाँफी है,
हमारा एक साथी, तुम्हारे सारे मन्त्रियों को निपटाने के लिए काफी है,

उसकी बात सुनकर हमें तो सिर्फ, इस बात पर मलाल आया,
कि एक मच्छर पूरे मन्त्रिमण्डल को, निपटाने की बात करता है,
लेकिन पूरा मन्त्रिमण्डल मिलकर, एक मच्छर जैसे पाकिस्तान को नही निपटा पाया ॥

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